शनिवार, 26 फ़रवरी 2022

इंतजार

तुम्हें इंतजार हो या ना हो,
हम तुम्हारे इंतजार का
इंतजार करते रहे।

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

आत्मसात

तुम आज फिर मुस्कराए
कड़ी धूप में ,किसी छाँव की तरह
तुम्हारी आँखे
कहा कुछ भी नहीं ,
देखा तक नहीं
मेरे होने के अहसास को
चुपचाप उठा ले गए
हर आड़ में तुम्हारी मौजूदगी
मेरे कल्पना को प्रसार दे गए
तुम उभर कर कभी सतह
पर नहीं आये
गहराई में जब भी गयी हूँ
हाथ खाली ही रहे
मगर मन हमेशा संतुष्ट रहा है

शनिवार, 5 फ़रवरी 2011

हम भले बहुत दूर
चले आए हो '
खुद को एक मुकाम तक
ले आए हो
पर अतीत में जो क्षण
जीये है हमने
उस याद की मिठास
व टीस
अभी भी वही है

शनिवार, 21 अगस्त 2010

प्रेरित

तुम हमेशा याद आते हो ,

जब भी मै पेन उठाता हूँ
मेरे लिखने से पहले
तुम्हारी आँखे उत्सुक हो जाती है
शब्द
जो शब्द ही रहते है
तुम उन्हें ऐसे दोहराते हो
जैसे उसके अर्थ तुम्हे संतृप्त कर रहे हो
कही कुछ नहीं होता
पर तुम उस पेपर को उठा
व्यथित व संवेदनशील हो जाते हो
समाज व व्यक्ति से जाती हुई
शब्दों की पंक्तियों में
एक शक्ति तो अवश्य ही है
जिसके बल पर तुम ,दूर होकर भी
एक आवाज देते हो
"रुक क्यों गए ,
और लिखो "
और मै इसी से प्रेरित हो जाता हूँ .

बुधवार, 5 मई 2010

वक्त अभी भी वही है

रंग दुनिया के
कई बार बदले
हर दृश्य जिंदगी के
बेहतर निकले
पर मेरे सुख दुःख के
पैमाने
अभी भी वही है

इस धूप को प्रतिदिन
मैंने देखा है
शब्द के हर रूप को
मैंने समझा है
अर्थ के आंच की तासीर
कैसी भी हो
मेरे सहने की क्षमता
अभी भी वही है

रिश्ते व मौसम
का मिजाज
बदलते तो गए
पर मेरा मन व
मेरी आँखे वही है
मै जानती हूँ
वेद की पंक्तिया बदलती नहीं
मेरे जेहन में
तुम्हारे निशां
अभी भी वही है

शनिवार, 27 मार्च 2010

पौधे

मै कल्पना के बीज लिए चलती रहती थी यहाँ वहाँ बिखराते हुए । तुम न जाने कहा से आ गए ,उन्हें अंकुरित होने दिया अपने आसपास । रोज मै देखती थी तुम्हे पानी देते हुए ,उन्हें सहलाते हुए । उन पौधो के बीच तुम भी खिल रहे थे लेकिन वे पौधे वो तो कल्पित थे तुम अकल्पित सा उनके बीच उन्ही को सींचते हुए । मै चकित रहती .तुम हमेशा संयमित । मेरे होने , ना होने व तुम्हारे होने या ना होने के बीच कुछ भी तारतम्य नहीं था । लेकिन तुम होते व मै होती तो कल्पना के पौधे होते और तुम उन्हें सींच रहे होते । तुम सबसे बेपरवाह दिखते ,मै तुमसे अनजान रहती ।
लेकिन वे पौधे जो तुम उगा रहे अपने आसपास ,उन्ही में छिप जाने के लिए ,हमारी नजर में आ जाते । अब जब कही वो पौधे दिखते तो लगता है कि तुम भी वही हो । चांदनी रात में सब स्याह पड़ी आवाजों के पार मै गुजर जाऊ वहाँ से , पेड़ के दरख्तों के बीच तुम यक़ीनन वहाँ होगे ।

बुधवार, 24 मार्च 2010

जागते रहो

रात की गहरी , चीखती
सन्नाटो में
कही कुछ खटकता है
जैसे किसी ने सेंध लगा दी हो
किसी के स्वप्न में
किसी की शांति में
किसी के घर में
किसी के बेसुध नींद में
कही कुनमुना उठता है शिशु
जैसे उससे छीन लिया गया हो
माँ का आँचल
कही अचानक आँख फाड़े
उठ बैठा हो कोई
शायद बुरा सपना है
नींद की रक्षा के लिए ही
रखे गए शख्स के मन में
कही कुछ खटकता है
तो वह स्वत: ही बोल उठता है
जागते रहो
लगता है सूर्य को सोने से
रोक रहा हो
ताकि सबेरा जल्दी हो
और वह निश्चिंत सो सके