मै कल्पना के बीज लिए चलती रहती थी यहाँ वहाँ बिखराते हुए । तुम न जाने कहा से आ गए ,उन्हें अंकुरित होने दिया अपने आसपास । रोज मै देखती थी तुम्हे पानी देते हुए ,उन्हें सहलाते हुए । उन पौधो के बीच तुम भी खिल रहे थे लेकिन वे पौधे वो तो कल्पित थे तुम अकल्पित सा उनके बीच उन्ही को सींचते हुए । मै चकित रहती .तुम हमेशा संयमित । मेरे होने , ना होने व तुम्हारे होने या ना होने के बीच कुछ भी तारतम्य नहीं था । लेकिन तुम होते व मै होती तो कल्पना के पौधे होते और तुम उन्हें सींच रहे होते । तुम सबसे बेपरवाह दिखते ,मै तुमसे अनजान रहती ।
लेकिन वे पौधे जो तुम उगा रहे अपने आसपास ,उन्ही में छिप जाने के लिए ,हमारी नजर में आ जाते । अब जब कही वो पौधे दिखते तो लगता है कि तुम भी वही हो । चांदनी रात में सब स्याह पड़ी आवाजों के पार मै गुजर जाऊ वहाँ से , पेड़ के दरख्तों के बीच तुम यक़ीनन वहाँ होगे ।
शनिवार, 27 मार्च 2010
बुधवार, 24 मार्च 2010
जागते रहो
रात की गहरी , चीखती
सन्नाटो में
कही कुछ खटकता है
जैसे किसी ने सेंध लगा दी हो
किसी के स्वप्न में
किसी की शांति में
किसी के घर में
किसी के बेसुध नींद में
कही कुनमुना उठता है शिशु
जैसे उससे छीन लिया गया हो
माँ का आँचल
कही अचानक आँख फाड़े
उठ बैठा हो कोई
शायद बुरा सपना है
नींद की रक्षा के लिए ही
रखे गए शख्स के मन में
कही कुछ खटकता है
तो वह स्वत: ही बोल उठता है
जागते रहो
लगता है सूर्य को सोने से
रोक रहा हो
ताकि सबेरा जल्दी हो
और वह निश्चिंत सो सके
सन्नाटो में
कही कुछ खटकता है
जैसे किसी ने सेंध लगा दी हो
किसी के स्वप्न में
किसी की शांति में
किसी के घर में
किसी के बेसुध नींद में
कही कुनमुना उठता है शिशु
जैसे उससे छीन लिया गया हो
माँ का आँचल
कही अचानक आँख फाड़े
उठ बैठा हो कोई
शायद बुरा सपना है
नींद की रक्षा के लिए ही
रखे गए शख्स के मन में
कही कुछ खटकता है
तो वह स्वत: ही बोल उठता है
जागते रहो
लगता है सूर्य को सोने से
रोक रहा हो
ताकि सबेरा जल्दी हो
और वह निश्चिंत सो सके
रविवार, 14 मार्च 2010
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