मै कल्पना के बीज लिए चलती रहती थी यहाँ वहाँ बिखराते हुए । तुम न जाने कहा से आ गए ,उन्हें अंकुरित होने दिया अपने आसपास । रोज मै देखती थी तुम्हे पानी देते हुए ,उन्हें सहलाते हुए । उन पौधो के बीच तुम भी खिल रहे थे लेकिन वे पौधे वो तो कल्पित थे तुम अकल्पित सा उनके बीच उन्ही को सींचते हुए । मै चकित रहती .तुम हमेशा संयमित । मेरे होने , ना होने व तुम्हारे होने या ना होने के बीच कुछ भी तारतम्य नहीं था । लेकिन तुम होते व मै होती तो कल्पना के पौधे होते और तुम उन्हें सींच रहे होते । तुम सबसे बेपरवाह दिखते ,मै तुमसे अनजान रहती ।
लेकिन वे पौधे जो तुम उगा रहे अपने आसपास ,उन्ही में छिप जाने के लिए ,हमारी नजर में आ जाते । अब जब कही वो पौधे दिखते तो लगता है कि तुम भी वही हो । चांदनी रात में सब स्याह पड़ी आवाजों के पार मै गुजर जाऊ वहाँ से , पेड़ के दरख्तों के बीच तुम यक़ीनन वहाँ होगे ।
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aap bahut achchha likhti hain
जवाब देंहटाएंbahut sunder shabd aur bhav likhna jaari rakhen - hardik shubhkamanayen
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